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Showing posts from 2020

कुछ यादें

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 2010 परीक्षा देकर छुट्टियों में मासी के यहाँ गई थी तब उनका  हरीद्वार जाने का कार्यक्रम बना और मैं भी वहाँ थी तो मुझे भी साथ ले गए।  मासूम मन था तो खुशी भी थी कि पहली बार किसी दूसरे राज्य में जाने का मौका मिल रहा था तो मैंनें भी मना नहीं किया।और मासूम मन जिसे घूमने का बहुत शौक है उसने यूँ तो कभी घर से बाहर की दुनिया देखी ना थी पर बचपन से अपनी कल्पनाओं में देश विदेश घूम लिया था। और जब किसी को बताती थी बचपन में तो सब हँसते थे कि पागल लड़की है  जो ऐसी बातें करती है और उस वक्त तक तो मोबाईल फोन या किताबें भी नहीं पढ़ी थी कि अपनी बात को सच साबित कर पाऊँ।पर सच ये है कि जब भी बालों की चोटी बनवाती थी जाने कहाँ कहाँ घूम आती थी।तो हरिद्वार और ऋषिकेश जाने का जब ये कार्यक्रम बना मैंनें बताया मासी को कौनसी जगह कहाँ पर होगी और जब वहाँ पहूँची तो सब हूबहू वैसा ही था जैसा मैंनें अपनी कल्पनाओं में देखा था। मेड़ता सिटी से मेड़ता रोड़ पहूँचकर कालका एक्सप्रेस के जनरल डब्बे में बैठकर यात्रा शुरू हुई ।और ट्रेन खाली थी तो मुझे अपनी पसंद की सीट मिल गई खिड़की के पास और रास्ते भर उस खिड़की पर सिर टिका...

मेरी टीचर

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डॉक्टर ब्लासम प्रिया पीटर्स यहीं नाम था मेरी माइक्रोबायोलॉजी की टीचर का जो कालेज में सबकी फेवरिट थी और मेरी भी फेवरिट थी मैम आप..  पर मेरे लिए स्पेशल बात ये थी कि मैं आपकी फेवरिट थी।  और ये उस दिन पता चला जब आप मेरे बर्थडे वाले दिन मुझे कालेज कैम्पस और हास्पिटल में ढूढ़ रहे थे। और आखिरी में मैं  मिली आपको हास्पिटल पार्किंग में । और कैसे आपने मुझे देखते ही आवाज दी थी ना मीना इधर आना और जब मैं आपके पास पहूँची तो आपका गले से लगा लेना आज भी याद आता है जैसे उस शहर की भीड़ मेेंं कोई अपना मिल गया जो मेरी आँखे पढ़ लेती थी जो मेरे डर को मेरी ताकत बनाने की बात करती थी।और फिर आपका वो प्यारा सा कीचैन और वो फाइवस्टार चाकलेट देना और कहना हैप्पी बर्थडे बच्चा और बोलना की क्लास खत्म करके मेरे पास आना। और उस दिन जब मैं आपके पास आई मेडिकल कालेज में तो आपका एक बार फिर से गले से लगाना और यीशु से मेरे लिए प्रार्थना करना सब मेरे लिए अचानक हुआ था।शायद इतना प्यार और अपनापन कभी देखा नहीं था तो आश्चर्यचकित थी। फिर तो जब भी परेशान होती थी बस आप ही दिखते थे जिनके पास जाकर कुछ कहना ही नहीं पड़ता थ...

पायल:सपनों भरी निगाहें

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पायल:सपनों भरी निगाहें 2017 दिसम्बर की बात है जब किरन की पाठशाला गई थी,उस वक्त मन बहुत परेशान था पर किरन ने बुलाया था तो चली गई। और वहीं मुलाकात हुई उन मासूमों से । प्यारे और मासूम बच्चे थे जिनकी हँसी और मुस्कुराहट में आप सारा दर्द भूल जाओ। उस दिन लगभग पूरा दिन वहीं बिताया था उन बच्चों के साथ और किरन और उसके परीवार के साथ उस दिन किरन के साथ ही वहाँ कई और अच्छे लोगों से मुलाकात हुई। जिनमें से कई लोग आज भी सम्पर्क में है। तो बात ये है कि किरन से जितनी बात नहीं हुई उस दिन उससे कई ज्यादा बात हुई उस पाठशाला में पढने वाले बच्चों से ...... बच्चों ने मुझसे काफी बातें की किसी ने गाना किसी ने कविता और किसी ने डांस और हाँ वहाँ बच्चों की बनाई ड्राईंग भी देखने को मिली। अब आती हूँ पायल पे पायल उन्हीं बच्चों में थोड़ी समझदार आठवीं कक्षा में पढने वाली लड़की थी।जब सब बच्चे बात कर रहे थे वो चुपचाप बैठी थी। पायल साँवले रंग और बड़ी बड़ी काली भूरी आँखों वाली लड़की थी।जब मैंनें उसे देखा तो उसके लब भले खामोश हो पर उसकी आँखें बात कर रही थी। उन आँखों में अनगिनत सपने भरे थे।फिर जब मैंनें उससे बात की तब उसन...

वो मासूम दोस्त

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इनकी याद आती है पूरे चार महीने हो गए इनसे मिले हुए। जब वो शहर छूटा तो उसके साथ ही ये नन्हें दोस्त भी बिछड़ गए।  जाने किस हाल में होगें अब ये इन हालातों में काश इन्हें कोई मदद करने वाला जरूर मिले।  लाइब्रेरी के बाहर इनसे लगभग रोज मुलाकात होती थी ।  और इनकी मासूमियत इतनी की किसी को तंग नहीं करते बस दिनभर वहीं कोने में बैठे रहते ।और मैं दिख जाती तो मुझसे कितने सवाल करते और हमेशा यहीं बोला करते दीदी आप हमारे लिए भी पेन्सिल और कापी ला दो ना । हमें भी पढ़ना सीखना है बस यहीं बात थी कि ये मासूम मेरे दोस्त बन गए।  और फिर तो जब कभी में खाना बनाकर ले जाती तो इनके साथ शेयर जरूर होता। सच ये छोटी छोटी बातें मेरे जीवन में बहुत बड़ी है। और कापी में पेन्सिल से अपना लिखा ऐसे दिखाते जैसे मैं इनकी टीचर हूँ। ये तस्वीर जबकि है जब पहली बार इन्हें देखा था और इन्हें बिना बताए ये तस्वीर ली थी । और जब ये मासूम इस झल्ली के दोस्त बन गए तो इनकी बातों में इतना खो जाती कि तस्वीर लेना याद ही नहीं रहा।बस ईश्वर से प्रार्थना है कि ये मासूम जहाँ भी हो स्वस्थ्य और मस्त हो।। #अजमेर_डायरी तेरे...

मजदूर ,मजबूर,पलायन और जिन्दगी

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मजदूर ,मजबूर,पलायन और जिन्दगी देखने में सबको तरस आ रहा है कि ये सब अपने गाँव पहूँच जाए पर क्या गाँव पहुँचकर इनकी समस्याएँ और तकलीफ कम हो जाएगी क्या इन्हें वहाँ दो वक्त की रोटी और जरूरी आवश्यकताएँ जो जीने के लिए जरूरी है रोटी,कपड़ा और मकान क्या वो सब मिल पाएगा। कागजों में तो इनकी सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी पर क्या हकीकत में ये लोग एक सामान्य जीवन जी पाएंगे। गाँव में ही अगर इनका जीवन आसान होता तो ये अपने गाँव को छोड़कर यूँ दूर देश ना जाते और जब ये वहाँ दो पैसे कमाकर अपना जीवनयापन कर रहे थे तो अचानक से ये सब हो गया ।इनके बच्चे जो किसी सरकारी स्कूल में पढ़ रहे थे और जो नहीं पढ़ रहे थे सबका भविष्य अधर में है पर नेता राजनीति कर रहे और हम लोग सांत्वना। पर इनके पलायन को रोककर ये जहाँ थे इनको वहीं रहने दिया जाता इनकी नौकरियों पर खतरा नहीं मंडराता। तो ये लोग यूँ सैकड़ों किलोमीटर तक पैदल चलने को विवश नहीं होते । और हाँ इनके साथ सिर्फ ये नहीं इनकी पत्नी और बच्चे भी है और कुछ औरतें पेट से होगी और कुछ महीने के उन कठिन दिनों में होगी। जिसके असहनीय दर्द की हम कल्पना नहीं कर सकते। और क्या उनके पास ...

वो तीन महीने

         वो तीन महीने लगभग तीन साल पहले शायद मई का ही महीना था जब मैं उस दिन शाम को मेरे अॉफिस (डायग्नोस्टिक सेन्टर)से अपने रुम(मेरा अपना घरजहाँ कि मालिक सिर्फ मैं थी) लौट रही थी कि कालोनी के गेट पे परी की मम्मी से मिलना हुआ।परी मेरी नन्ही सी दोस्त है जिसके साथ अक्सर शाम को आफिस से आने के बाद कालोनी के चक्कर लगाया करती थी और उस दिन परी की मम्मी कुछ परेशान लग रही थी तो मैं वहीं रूककर उनसे बात करने लगी ।और उनसे पूछा तो पता चला कि उनकी एक दोस्त प्रेगनेंट है और उनकी सास कैन्सर पेशेंट और वो बिस्तर से हिल भी नहीं सकते और कोई ऐसा चाहिए जो उनकी ड्रेसिंग, कैथैटर(पेशाब की नली) और इंजेक्शन लगा दे।पर वो ज्यादा पैसे नहीं खर्च कर सकते तो किसी को उनकी केयर के लिए नहीं रख सकते और अभी उनको यहीं पास में नसियाँ जी में एक कमरा लेके रखा है क्योंकि घर इतना पुराना है और किराये का है तो सीढ़ियाँ चढ़ना सम्भव नहीं है। तो मैंने पता नहीं क्या सोचा और उनसे कहा कि आप उनको मेरा नम्बर दे दिजिएगा। और फिर मैं रुम पे आके खाना बनाने लगी कि इतने में ही परी की मम्मी की दोस्त का फोन आया। उन्हो...

प्रकृति और हम

प्रकृति तो यूँ हीं इन्सान पर कूपित है इसीलिए इस बार किसी बाढ़ भूकम्प या और किसीजलजले से ना चेताकर एक अदृश्य विषाणु के रूप में अपना क्रोध प्रकट कर रही है और हम इन्सान फिर भी उसके इशारे को नहीं समझ पा रहे। प्रकृति अब आपको चेतावनी देने के मूड में बिल्कुल नहीं है अब वो उसके साथ हुए खिलवाड़ का बदला अपने तरीके से ले रही है जिस इन्सान को अपनी तरक्की और टेक्नोलॉजी पर घमंड था जो खुद को प्रकृति से भी सर्वोपरि समझने लगा था प्रकृति ने उसे उसकी औकात से रुबरू करवा दिया है पर फिर भी इन्सान किस मद में चूर है ये समझ नहीं आ रहा है।21दिन के इस लाकडाउन के कारण प्रकृति ने स्वयं ही अपने अंदर फैलै प्रदूषण को दूर करने की पूरी कोशिश की जिसका नतीजा प्रदूषण स्तर घटकर लगभग 350 से 60 -65 तक आ गया पर हम भारत के महान लोगों से ये कहाँ बर्दाश्त हो सकता है हमें तो प्रदूषण वाली आबोहवा कुछ ज्यादा ही पंसद है बस इसीलिए शायद आज दिया जलाने के साथ साथ खूब पटाखे जलाए और फिर एक बार प्रकृति को नुकसान पहूँचाने के प्रयास किये है। परन्तू जब प्रकृति अपने पर आएगी तब क्या होगा इसकी कल्पना से ही इन्सान सिहर उठेगा। तो अब भी वक्त है संभल ज...
जरस की आवाज आती थी जहाँ से,आज वहीं पर सूनापन है, जिनके दर पर हूजूम हुआ करता था,आज वहीं दरवाजे बंद है, भीड़ भरा था हर आँगन गलियारा शहरों से लेकर गाँवों तक, आपस में मिलकर हँसते गाते थे आज वहीं पर सन्नाटे कायम है।। तेरे बिन तेरे संग राधे कृष्ण #मीनू©✍️
बात तो इब्तिदा की है बाकि कोशिशें ख़्वाहिशों का पता दे ही देती है।। तेरे बिन तेरे संग राधे कृष्ण #मीनू©✍️