वो मासूम दोस्त

इनकी याद आती है पूरे चार महीने हो गए इनसे मिले हुए।
जब वो शहर छूटा तो उसके साथ ही ये नन्हें दोस्त भी बिछड़ गए।

 जाने किस हाल में होगें अब ये इन हालातों में काश इन्हें कोई मदद करने वाला जरूर मिले। 
लाइब्रेरी के बाहर इनसे लगभग रोज मुलाकात होती थी । 
और इनकी मासूमियत इतनी की किसी को तंग नहीं करते बस दिनभर वहीं कोने में बैठे रहते ।और मैं दिख जाती तो मुझसे कितने सवाल करते और हमेशा यहीं बोला करते दीदी आप हमारे लिए भी पेन्सिल और कापी ला दो ना ।
हमें भी पढ़ना सीखना है बस यहीं बात थी कि ये मासूम मेरे दोस्त बन गए।
 और फिर तो जब कभी में खाना बनाकर ले जाती तो इनके साथ शेयर जरूर होता।
सच ये छोटी छोटी बातें मेरे जीवन में बहुत बड़ी है।
और कापी में पेन्सिल से अपना लिखा ऐसे दिखाते जैसे मैं इनकी टीचर हूँ।
ये तस्वीर जबकि है जब पहली बार इन्हें देखा था और इन्हें बिना बताए ये तस्वीर ली थी ।
और जब ये मासूम इस झल्ली के दोस्त बन गए तो इनकी बातों में इतना खो जाती कि तस्वीर लेना याद ही नहीं रहा।बस ईश्वर से प्रार्थना है कि ये मासूम जहाँ भी हो स्वस्थ्य और मस्त हो।।
#अजमेर_डायरी
तेरे बिन तेरे संग
राधे कृष्ण
#मीनू©✍️

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