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खतरा सिर्फ इंसान पर नहीं इंसानियत पर भी

जिंदगी का यह दौर बहुत नाजुक है इतना नाजुक कि जैसे पानी का बुलबुला है हाथ लगाओ उससे पहले ही वह खत्म हो जाए । लेकिन फिर भी वह पानी का बुलबुला दोबारा बनता है फिर वही क्रिया चालू रहती है । सागर की लहरें किनारे आती है मिट जाती है।लेकिन वो किनारे आना बंद नहीं करती।ठीक उसी तरह लगातार परेशानियों के इस दौर में हम हार मानकर नहीं बैठ सकते हमें लड़ना होगा और जीतना भी होगा ।क्योंकि हम इंसान हैं और इंसानी फितरत में हार कर बैठना हो ही नहीं सकता ।उस ईश्वर ने हमें वो ताकत बक्शी है कि हम हर मुसीबत से लड़ सकते हैं और उस से पार पा सकते हैं । मैं अक्सर देखती हूं कि फौज में जब कोई  सैनिक शहीद होता है तो कितना कुछ खत्म हो जाता है उसके पीछे लेकिन उसका परिवार उसकी पत्नी उस शहादत को व्यर्थ नहीं जाने देते बल्कि जो काम देश के प्रति वो अधूरा छोड़कर गया उसे पूरा करने के लिए वो खुद वर्दी पहन सेना में चली जाती है। तो बताओ वो भी एक इन्सान ही है ना पर उसे हमसे अलग करती है उसकी जीजीविषा जो उसे लड़ने के लिए तैयार करती  है। वह शहीद की शहादत को बेकार नहीं होना देना चाहती। जब वो जिंदगी के बुरे दौर से लड़कर भी हिम्मत ...

खत गुमनाम सा

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गुमनाम दोस्त के नाम मुझे नहीं पता ये खत मैं किस के लिए लिख रही हूँ बस लिख रही हूँ शायद मन में जो सवाल है कहीं दूर चले जाए जो डर है वो फुर हो जाए। वैसे तो लोगों को उसको देखकर लगता होगा कि वो कितनी एक्सट्रोवर्ट है हो भी सकता है उनकी नजर में होगी। पर सच कहूँ तो वो अपने मन की बात भी खुल कर कह नहीं पाती और कोई कुछ कह दे और जो रो दे तो लोग सोचते है कि नाटक होगा।पर रोना नाटक तो नहीं मन को भी चोट लगती है वो भी तड़पता है और बस वहीं घाव आँसुओं में बहकर भरना चाहते होंगे। वैसे तो कोई शिकायत नहीं तुमको किसी से पर सारे इल्जाम खुद पर डाल देती हो और फिर तलाशती हो सिर्फ अपनी गलतियाँ और ना मिले तो फिर चुप हो जाती हो ठीक वैसे ही जैसे अंधेरी रात का सन्नाटा। पर तुम कब तक ऐसी बनी रहोगी बिना गलतियों के सजा भुगतती रहोगी। हाँ तुम सोच रही होगी कि क्या बोल रही हूँ तुमको पर देखो तुम्हारी खिलखिलाहट के साथ हवा गाती है पंछी चहचहाते है बारिशें आती है और तुम हो कि यूँ उदास हो। हाँ उदासी है माना , उदासी के हजार कारण है पर तेरे हँसने को एक बहाना काफी है।और जब भी मन करे मेरा ये खत पढ़ना और खुद की तलाश में निकल पड़ना ज...

औरत

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 जब बैठे हो राजा बन धृतराष्ट्र दरबार में चीर खींचते दिख जाते दुशासन दरबार में गांधारी जब पाप देखकर अंधी हो जाती है तभी फेंकते मामा शकुनि पासे दरबार में झूठी  चालों में जब धर्मराज फँस जाते है तब दुर्योधन ठहाके लगा हँसते दरबार में जब अपमान हुआ कुलवधू द्रोपदी का कुरूवंश का अंत दिखा उसी वक्त दरबार में मौन खड़े थे भीष्म पितामह साधी चुप्पी द्रोण ने गुहार लगाकर घूम रही पांचाली दरबार में पाडंव रक्षा कर न सके नजर झुकाए बैठे थे तब आकर मधूसूदन ने लाज बचाई दरबार में उस वक्त एक दुशासन और दुर्योधन था अब हर घर में मिल जाते हैं काम वासना के भूखे  ये औरत का जिस्म नोंच खाते है अब कृष्ण कहाँ आ पाते लाज बचाने को या तो खुद मर जाती है या मार दी जाती  अब कहाँ बच पाती द्रौपदी इन हैवानों से अब डरकर जीवन जीने से क्या होगा बनकर योद्धा खुद को ही महाभारत लड़ना होगा अब अर्जुन और माधव से नहीं खुद थाम लगाम रथ की हाथों में शस्त्र धरना होगा। तेरे बिन तेरे संग राधे कृष्ण #मीनू©✍️