प्रकृति और हम
प्रकृति तो यूँ हीं इन्सान पर कूपित है इसीलिए इस बार किसी बाढ़ भूकम्प या और किसीजलजले से ना चेताकर एक अदृश्य विषाणु के रूप में अपना क्रोध प्रकट कर रही है और हम इन्सान फिर भी उसके इशारे को नहीं समझ पा रहे। प्रकृति अब आपको चेतावनी देने के मूड में बिल्कुल नहीं है अब वो उसके साथ हुए खिलवाड़ का बदला अपने तरीके से ले रही है जिस इन्सान को अपनी तरक्की और टेक्नोलॉजी पर घमंड था जो खुद को प्रकृति से भी सर्वोपरि समझने लगा था प्रकृति ने उसे उसकी औकात से रुबरू करवा दिया है पर फिर भी इन्सान किस मद में चूर है ये समझ नहीं आ रहा है।21दिन के इस लाकडाउन के कारण प्रकृति ने स्वयं ही अपने अंदर फैलै प्रदूषण को दूर करने की पूरी कोशिश की जिसका नतीजा प्रदूषण स्तर घटकर लगभग 350 से 60 -65 तक आ गया पर हम भारत के महान लोगों से ये कहाँ बर्दाश्त हो सकता है हमें तो प्रदूषण वाली आबोहवा कुछ ज्यादा ही पंसद है बस इसीलिए शायद आज दिया जलाने के साथ साथ खूब पटाखे जलाए और फिर एक बार प्रकृति को नुकसान पहूँचाने के प्रयास किये है। परन्तू जब प्रकृति अपने पर आएगी तब क्या होगा इसकी कल्पना से ही इन्सान सिहर उठेगा। तो अब भी वक्त है संभल ज...