कुछ यादें
2010 परीक्षा देकर छुट्टियों में मासी के यहाँ गई थी तब उनका हरीद्वार जाने का कार्यक्रम बना और मैं भी वहाँ थी तो मुझे भी साथ ले गए। मासूम मन था तो खुशी भी थी कि पहली बार किसी दूसरे राज्य में जाने का मौका मिल रहा था तो मैंनें भी मना नहीं किया।और मासूम मन जिसे घूमने का बहुत शौक है उसने यूँ तो कभी घर से बाहर की दुनिया देखी ना थी पर बचपन से अपनी कल्पनाओं में देश विदेश घूम लिया था। और जब किसी को बताती थी बचपन में तो सब हँसते थे कि पागल लड़की है जो ऐसी बातें करती है और उस वक्त तक तो मोबाईल फोन या किताबें भी नहीं पढ़ी थी कि अपनी बात को सच साबित कर पाऊँ।पर सच ये है कि जब भी बालों की चोटी बनवाती थी जाने कहाँ कहाँ घूम आती थी।तो हरिद्वार और ऋषिकेश जाने का जब ये कार्यक्रम बना मैंनें बताया मासी को कौनसी जगह कहाँ पर होगी और जब वहाँ पहूँची तो सब हूबहू वैसा ही था जैसा मैंनें अपनी कल्पनाओं में देखा था। मेड़ता सिटी से मेड़ता रोड़ पहूँचकर कालका एक्सप्रेस के जनरल डब्बे में बैठकर यात्रा शुरू हुई ।और ट्रेन खाली थी तो मुझे अपनी पसंद की सीट मिल गई खिड़की के पास और रास्ते भर उस खिड़की पर सिर टिका...