मजदूर ,मजबूर,पलायन और जिन्दगी
मजदूर ,मजबूर,पलायन और जिन्दगी
देखने में सबको तरस आ रहा है कि ये सब अपने गाँव पहूँच जाए पर क्या गाँव पहुँचकर इनकी समस्याएँ और तकलीफ कम हो जाएगी क्या इन्हें वहाँ दो वक्त की रोटी और जरूरी आवश्यकताएँ जो जीने के लिए जरूरी है रोटी,कपड़ा और मकान क्या वो सब मिल पाएगा।
कागजों में तो इनकी सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी पर क्या हकीकत में ये लोग एक सामान्य जीवन जी पाएंगे।
गाँव में ही अगर इनका जीवन आसान होता तो ये अपने गाँव को छोड़कर यूँ दूर देश ना जाते और जब ये वहाँ दो पैसे कमाकर अपना जीवनयापन कर रहे थे तो अचानक से ये सब हो गया ।इनके बच्चे जो किसी सरकारी स्कूल में पढ़ रहे थे और जो नहीं पढ़ रहे थे सबका भविष्य अधर में है पर नेता राजनीति कर रहे और हम लोग सांत्वना।
पर इनके पलायन को रोककर ये जहाँ थे इनको वहीं रहने दिया जाता इनकी नौकरियों पर खतरा नहीं मंडराता। तो ये लोग यूँ सैकड़ों किलोमीटर तक पैदल चलने को विवश नहीं होते । और हाँ इनके साथ सिर्फ ये नहीं इनकी पत्नी और बच्चे भी है और कुछ औरतें पेट से होगी और कुछ महीने के उन कठिन दिनों में होगी। जिसके असहनीय दर्द की हम कल्पना नहीं कर सकते। और क्या उनके पास सैनैटरी हाइजीन के साधन उपलब्ध होगें? इसका जवाब है नहीं पर फिर भी वो चल रहे है हजारों किलोमीटर दूर अपने गाँव लौटने को पर क्या गाँव भी उनका वैसे ही इन्तजार कर रहा है। जैसे वो.... पर शायद नहीं कुछ लोग रास्ते में दम तोड़ देगें और जो कुछ गाँव पहुंच भी गए तो उनके साथ जो अमानवीय व्यवहार होगा।।
वो ईश्वर ही जाने और कुछ लोग तो उन्हें अपने ही घर में रहने को जगह नहीं देगें ये कहकर की तुम्हें तो कोरोना है पर वो होगा बिल्कुल ठीक ।
और जब वो अपने जीवन की जिन मूलभूत आवश्यकताओं को शहर में मेहनत करके बिना किसी के सहारे जुटा रहे थे।
पर अब जब वो यहाँ नहीं जुटा पाएगे। तो आत्महत्या जैसा कदम उठाएंगे।
और इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा कोई नहीं बस उनकी मौत पर होगी राजनीति...
उनको पलायन करने देने की बजाय बेहतर होता कि सरकार और.हम आस पास के लोग उनको विश्वास दिलाते कि जहाँ है वहीं रहे उनकी नौकरियों पर कोई खतरा नहीं होगा ।और जो राशन का सामान यहाँ पहुँचाने का दावा कर रहे है वो अगर वहीं पहुँचा देते तो शायद ये मजदूर(मजबूर) अपनी जिन्दगी से यूँ पलायन करके हजारों कदम पैदल चलने को मजबूर ना होते।।
तेरे बिन तेरे संग
राधे कृष्ण
#मीनू©✍️
देखने में सबको तरस आ रहा है कि ये सब अपने गाँव पहूँच जाए पर क्या गाँव पहुँचकर इनकी समस्याएँ और तकलीफ कम हो जाएगी क्या इन्हें वहाँ दो वक्त की रोटी और जरूरी आवश्यकताएँ जो जीने के लिए जरूरी है रोटी,कपड़ा और मकान क्या वो सब मिल पाएगा।
कागजों में तो इनकी सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी पर क्या हकीकत में ये लोग एक सामान्य जीवन जी पाएंगे।
गाँव में ही अगर इनका जीवन आसान होता तो ये अपने गाँव को छोड़कर यूँ दूर देश ना जाते और जब ये वहाँ दो पैसे कमाकर अपना जीवनयापन कर रहे थे तो अचानक से ये सब हो गया ।इनके बच्चे जो किसी सरकारी स्कूल में पढ़ रहे थे और जो नहीं पढ़ रहे थे सबका भविष्य अधर में है पर नेता राजनीति कर रहे और हम लोग सांत्वना।
पर इनके पलायन को रोककर ये जहाँ थे इनको वहीं रहने दिया जाता इनकी नौकरियों पर खतरा नहीं मंडराता। तो ये लोग यूँ सैकड़ों किलोमीटर तक पैदल चलने को विवश नहीं होते । और हाँ इनके साथ सिर्फ ये नहीं इनकी पत्नी और बच्चे भी है और कुछ औरतें पेट से होगी और कुछ महीने के उन कठिन दिनों में होगी। जिसके असहनीय दर्द की हम कल्पना नहीं कर सकते। और क्या उनके पास सैनैटरी हाइजीन के साधन उपलब्ध होगें? इसका जवाब है नहीं पर फिर भी वो चल रहे है हजारों किलोमीटर दूर अपने गाँव लौटने को पर क्या गाँव भी उनका वैसे ही इन्तजार कर रहा है। जैसे वो.... पर शायद नहीं कुछ लोग रास्ते में दम तोड़ देगें और जो कुछ गाँव पहुंच भी गए तो उनके साथ जो अमानवीय व्यवहार होगा।।
वो ईश्वर ही जाने और कुछ लोग तो उन्हें अपने ही घर में रहने को जगह नहीं देगें ये कहकर की तुम्हें तो कोरोना है पर वो होगा बिल्कुल ठीक ।
और जब वो अपने जीवन की जिन मूलभूत आवश्यकताओं को शहर में मेहनत करके बिना किसी के सहारे जुटा रहे थे।
पर अब जब वो यहाँ नहीं जुटा पाएगे। तो आत्महत्या जैसा कदम उठाएंगे।
और इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा कोई नहीं बस उनकी मौत पर होगी राजनीति...
उनको पलायन करने देने की बजाय बेहतर होता कि सरकार और.हम आस पास के लोग उनको विश्वास दिलाते कि जहाँ है वहीं रहे उनकी नौकरियों पर कोई खतरा नहीं होगा ।और जो राशन का सामान यहाँ पहुँचाने का दावा कर रहे है वो अगर वहीं पहुँचा देते तो शायद ये मजदूर(मजबूर) अपनी जिन्दगी से यूँ पलायन करके हजारों कदम पैदल चलने को मजबूर ना होते।।
तेरे बिन तेरे संग
राधे कृष्ण
#मीनू©✍️

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