कुछ यादें


 2010

परीक्षा देकर छुट्टियों में मासी के यहाँ गई थी तब उनका  हरीद्वार जाने का कार्यक्रम बना और मैं भी वहाँ थी तो मुझे भी साथ ले गए। 
मासूम मन था तो खुशी भी थी कि पहली बार किसी दूसरे राज्य में जाने का मौका मिल रहा था तो मैंनें भी मना नहीं किया।और मासूम मन जिसे घूमने का बहुत शौक है उसने यूँ तो कभी घर से बाहर की दुनिया देखी ना थी पर बचपन से अपनी कल्पनाओं में देश विदेश घूम लिया था। और जब किसी को बताती थी बचपन में तो सब हँसते थे कि पागल लड़की है  जो ऐसी बातें करती है और उस वक्त तक तो मोबाईल फोन या किताबें भी नहीं पढ़ी थी कि अपनी बात को सच साबित कर पाऊँ।पर सच ये है कि जब भी बालों की चोटी बनवाती थी जाने कहाँ कहाँ घूम आती थी।तो हरिद्वार और ऋषिकेश जाने का जब ये कार्यक्रम बना मैंनें बताया मासी को कौनसी जगह कहाँ पर होगी और जब वहाँ पहूँची तो सब हूबहू वैसा ही था जैसा मैंनें अपनी कल्पनाओं में देखा था।
मेड़ता सिटी से मेड़ता रोड़ पहूँचकर कालका एक्सप्रेस के जनरल डब्बे में बैठकर यात्रा शुरू हुई ।और ट्रेन खाली थी तो मुझे अपनी पसंद की सीट मिल गई खिड़की के पास और रास्ते भर उस खिड़की पर सिर टिकाए बाहर देखते देखते फिर शुरु हुई अपनी कल्पनाओं की यात्रा।
और.फिर सुबह सवेरे हम पहूँचे हरिद्वार और वहाँ से सीधा रिक्शा लेके शान्तिकुञ्ज चले आए।और फिर वहाँ सामान रखा और वहाँ से सीधा हर की पौड़ी और रास्ते में मुझे वो सारी जगह दिखी जो मैंने अपनी कल्पनाओं में पहले ही देख ली थी  सब कुछ ठीक वैसै ही था जैसा मैंने महसूस किया।
फिर बारी आई गंगा मईया में डूबकी लगाने की तो सबसे पहले पानी में हाथ डाला  तो पानी ठंडा था पर उसकी चमक आँखों में यूं बस गई जैसे आसमान में सितारे ,कितनी देर तक निहार रही थी गंगाजल को ।
फिर वक्त आया वहाँ से मनसा माता के मंदिर जाने का मेरा मन तो था कि पैदल चढाई की जाए पर मासी के बच्चे उड़न खटोले से जाना चाहते थे तो फिर उड़न खटोले में बैठकर पहूँचे हम मनसा मईया के दरबार।कितनी भीड़ थी बड़ों की ,वहाँ भीड़ में दम ही घुटने लग गया।अब बात ये कि ना तो आगे निकल सकते और ना पीछे जा सकते ।फिर कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए।तो दिमाग में एक आइडिया आया कि एक तो बच्ची हूँ और भीड़ में परेशान और ये भी पता था कि इन बड़े लोगों के बीच तो मुझे मईया दिखनी भी नहीं तो।बस फिर क्या था रेलिंग वाले पोल पे चढ़ गई और फिर दर्शन भी हुए ,भीड़ से भी बच गए और मईया की कृपा से डाँट भी नहीं खाई।.बाकि काम पूरा डाँट खाने वाला की थी पर जब मन साफ था और मईया को देखना था तो कैसे मईया डाँट खाने देती।
फिर शाम 4बजे के लगभग हम फिर से शांतिकुंज आ गये। और फिर उसी कैम्पस में गायत्री शक्तिपीठ का दर्शन हुआ ।और पं.श्री राम शर्मा और उनकी धर्मपत्नी की समाधि का दर्शन किया और फिर पहूँचे देवात्मा हिमालय के मंदिर में जहाँ अद्भूत शांति थी वहाँ यूं तो मौन था पर फिर भी कुछ था जो मन से बातें कर रहा था।वहाँ सब आँखें बंद करके बैठे थे पर मैं आँखें खोलकर सबके चेहरे देख रही थी।और एक बड़ी सुन्दर बात पता चली की जिन चेहरों पर बाहर शिकन थी वो बिल्कुल शांत थे जैसे कोई लालसा ना बची हो मन में। और ये सारा जादू था उस पवित्र तपोभूमि का जहाँ हर रोज यज्ञ और गायत्री मंत्र का जाप होता है।
फिर अगले दिन हम पहूँचे ऋषिकेश वहाँ पहूँचते ही हम सीधा लक्ष्मण झूला गये और वहाँ से नौखण्ड मंदिर(ठीक से नाम याद नहीं) गए। लक्ष्मण झूले के नाम से मन में था कि कोई झूला होगा पर वो तो एक पुल था लेकिन उस पर चलते हुए लग रहा था जैसे झूला ही हो।
उसके बाद गंगा घाट पर गंगा मईया में डूबकी लगाने की बारी आई और बाकी सब का पता नहीं पर वहाँ घाट से दिखते पहाड़ रिवर राफ्टिंग करते लोग सब मन को आकर्षित कर रहे थे यूँ लग रहा था मानो मैं भी उन्हीं का हिस्सा  हूँ।
फिर सब लोगों को मार्केट जाना था और मुझे वहीं बैठना था तो थकने का बहाना करके वहीं बैठी रही और खूबसूरत नजारे और माँ गंगा के जल की शीतलता का अनुभव करती रही।
और वादा किया था कि जब भी कभी मौका मिला तो अकेले आऊंगी। इस सुकून को एक बार फिर जीने।
उस दिन में ऋषिकेश से तो आ गई पर खुद को वहीं उस घाट किनारे छोड़ आई और ऋषिकेश को अपने मन में कैद कर लाई।
10साल 6महिने हो गए पर विश्वास है कि एक दिन फिर वहीं गंगा का किनारा होगा और मैं...
तेरे बिन तेरे संग
राधे कृष्ण#
मीनू©✍️
Pic:-google

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