खत गुमनाम सा
गुमनाम दोस्त के नाम मुझे नहीं पता ये खत मैं किस के लिए लिख रही हूँ बस लिख रही हूँ शायद मन में जो सवाल है कहीं दूर चले जाए जो डर है वो फुर हो जाए।
वैसे तो लोगों को उसको देखकर लगता होगा कि वो कितनी एक्सट्रोवर्ट है हो भी सकता है उनकी नजर में होगी। पर सच कहूँ तो वो अपने मन की बात भी खुल कर कह नहीं पाती और कोई कुछ कह दे और जो रो दे तो लोग सोचते है कि नाटक होगा।पर रोना नाटक तो नहीं मन को भी चोट लगती है वो भी तड़पता है और बस वहीं घाव आँसुओं में बहकर भरना चाहते होंगे।
वैसे तो कोई शिकायत नहीं तुमको किसी से पर सारे इल्जाम खुद पर डाल देती हो और फिर तलाशती हो सिर्फ अपनी गलतियाँ और ना मिले तो फिर चुप हो जाती हो ठीक वैसे ही जैसे अंधेरी रात का सन्नाटा।
पर तुम कब तक ऐसी बनी रहोगी बिना गलतियों के सजा भुगतती रहोगी।
हाँ तुम सोच रही होगी कि क्या बोल रही हूँ तुमको पर देखो तुम्हारी खिलखिलाहट के साथ हवा गाती है पंछी चहचहाते है बारिशें आती है और तुम हो कि यूँ उदास हो।
हाँ उदासी है माना , उदासी के हजार कारण है पर तेरे हँसने को एक बहाना काफी है।और जब भी मन करे मेरा ये खत पढ़ना और खुद की तलाश में निकल पड़ना जिसे तुम बहुत पीछे छोड़ आई हो ।और हाँ याद रखना खुद का कांधा खुद बनना खुद की हिम्मत और हौसला भी खुद बनना क्योंकि जो कहते है साथ है वो भी वक्त आने पर आवाज दोगी तो बहाने बनाकर कहीं दूर निकल जाएंगे।
क्योंकि कि जब रास्ते मुश्किल हो जाए तो साथ देने वाले खत्म हो जाते है।पर हाँ खुद अपने दम पर उठ खड़ी हुई ना तो जो आज लात मार रहे है वो भी हाथ जोड़े नजर आएंगे।जो आज नजरअंदाज कर रहे जिन्हें समय नहीं वो सब फिर तेरे हो जाएंगे। पर शायद तब तक तुम इतनी मजबूत हो जाओ कि तुम्हें फर्क पड़ना ही बंद हो जाए।
पर याद रखना तुम उन जैसी नहीं हो सकती।
पर याद रखना तुम उन जैसी नहीं हो सकती।
तुम अपनी सच्चाई और अच्छाई कभी मत खोना।
तुम्हारी गुमनाम
दोस्त
तेरे बिन तेरे संग
राधे कृष्ण
#मीनू©✍️
दोस्त
तेरे बिन तेरे संग
राधे कृष्ण
#मीनू©✍️

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